नई दिल्ली। एक तरफ देश का युवा नौकरी की तलाश में दर-दर भटक रहा है। किसान अपनी फसल का उचित दाम मांग रहा है। रसोई का बजट लगातार महंगाई की मार झेल रहा है। दूसरी तरफ सुर्खियों में है “मोदी चालीसा”। सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर देश की प्राथमिकताएं क्या हैं और लोकतांत्रिक राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ रही है?
आज आयोजित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धार्मिक स्वरूप में प्रस्तुत करते हुए “भगवान श्री नरेंद्र मोदी चालीसा” का विमोचन किया गया। कार्यक्रम की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए। समर्थकों ने इसे प्रधानमंत्री के प्रति सम्मान बताया, जबकि आलोचकों ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ व्यक्तिपूजा का उदाहरण करार दिया।
मुद्दे गायब, महिमामंडन हावी?
भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। सरकार विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती ताकत की बात करती है। लेकिन इसके साथ-साथ बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की आय और शिक्षा जैसे मुद्दे भी लगातार चर्चा में बने हुए हैं।
ऐसे समय में जब लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार के अवसरों को लेकर चिंता में हैं, तब किसी राजनीतिक नेता के नाम पर चालीसा का विमोचन कई लोगों को असहज कर रहा है।
सोशल मीडिया पर एक यूजर ने लिखा, “हमें रोजगार चाहिए या आरती?” वहीं दूसरे ने टिप्पणी की, “जब जनता सवाल पूछती है तो उसे जवाब नहीं मिलता, लेकिन नेताओं की महिमा गाने के लिए पूरा मंच तैयार हो जाता है।”
लोकतंत्र में नेता या भगवान?
भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां नेता जनता द्वारा चुने जाते हैं। लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यही है कि जनता अपने प्रतिनिधियों से सवाल पूछ सकती है, उनके काम का मूल्यांकन कर सकती है और जरूरत पड़ने पर सत्ता बदल सकती है।
लेकिन जब किसी नेता को भगवान के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगे, तो आलोचकों का कहना है कि इससे लोकतांत्रिक जवाबदेही कमजोर होती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी नेता के प्रति सम्मान और व्यक्तिपूजा के बीच एक स्पष्ट अंतर होता है। सम्मान लोकतंत्र को मजबूत करता है, जबकि अंधभक्ति सवाल पूछने की संस्कृति को कमजोर कर सकती है।
किसानों की चिंता, लेकिन चर्चा कहीं और
देश का किसान आज भी मौसम, लागत और बाजार की अनिश्चितताओं से जूझ रहा है। कई राज्यों में किसान संगठनों ने फसलों के बेहतर दाम और राहत पैकेज की मांग उठाई है।
लेकिन इन मुद्दों पर व्यापक बहस की बजाय जब राजनीतिक महिमामंडन चर्चा का केंद्र बन जाता है, तो सवाल उठते हैं कि क्या असली मुद्दे पीछे छूट रहे हैं?
एक किसान नेता ने हाल ही में कहा था, “हमें पूजा-पाठ नहीं, हमारी फसल का सही मूल्य चाहिए।”
यह बयान भले राजनीतिक हो, लेकिन यह उस वर्ग की बेचैनी को भी दर्शाता है जो अपनी रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान चाहता है।
महंगाई पर जनता की नाराजगी
रसोई गैस, खाद्य पदार्थ और रोजमर्रा की कई जरूरतों की कीमतों को लेकर आम आदमी पहले से दबाव महसूस कर रहा है। हाल के दिनों में चीनी की बढ़ती कीमतों पर भी बहस तेज हुई है।
ऐसे में आम नागरिक का सवाल सीधा है—क्या सरकार और राजनीतिक दलों को जनता की आर्थिक परेशानियों पर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए ?
कोइरीपुर के एक दुकानदार अनुराग त्रिपाठी ने कहा, “ग्राहक कम हो रहे हैं, खर्च बढ़ रहा है। हमें नेताओं की चालीसा नहीं, बाजार में राहत चाहिए।”
समर्थकों का पक्ष भी समझना जरूरी
इस पूरे विवाद का दूसरा पक्ष भी है। प्रधानमंत्री मोदी के समर्थकों का कहना है कि देश और दुनिया में भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा, बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट और कई कल्याणकारी योजनाओं के कारण लोग उनके प्रति भावनात्मक जुड़ाव महसूस करते हैं।
उनका तर्क है कि किसी नेता के प्रति सम्मान व्यक्त करना लोकतांत्रिक अधिकार है और इसे गलत नजर से नहीं देखा जाना चाहिए।
लेकिन आलोचकों का जवाब है कि सम्मान और धार्मिक महिमामंडन एक जैसी चीजें नहीं हैं।
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस
“मोदी चालीसा” कार्यक्रम के बाद सोशल मीडिया दो हिस्सों में बंटा दिखाई दिया। एक वर्ग इसे श्रद्धा और समर्थन का प्रतीक बता रहा है, जबकि दूसरा वर्ग इसे लोकतंत्र में बढ़ती व्यक्तिपूजा का संकेत मान रहा है।
कई यूजर्स ने सवाल उठाया कि क्या देश की राजनीति अब मुद्दों से ज्यादा व्यक्तियों के इर्द-गिर्द घूमने लगी है?
यह बहस नई नहीं है। भारत सहित दुनिया के कई लोकतंत्रों में करिश्माई नेताओं के इर्द-गिर्द व्यक्तित्व-आधारित राजनीति देखने को मिलती रही है। लेकिन जब यह राजनीति आलोचना और सवालों की जगह लेने लगे, तब चिंता बढ़ जाती है।
आखिर लोकतंत्र जा कहां रहा है?
यह सवाल केवल किसी एक नेता, एक पार्टी या एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। असली सवाल लोकतंत्र की दिशा को लेकर है।
क्या लोकतंत्र का मतलब नेताओं की पूजा है?
या फिर लोकतंत्र का मतलब है कि जनता अपने नेताओं से कठिन सवाल पूछे, उनकी नीतियों की समीक्षा करे और उन्हें जवाबदेह बनाए?
जब बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और किसानों की समस्याएं मौजूद हों, तब जनता की उम्मीद होती है कि राष्ट्रीय बहस इन्हीं मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमे।
निष्कर्ष
“मोदी चालीसा” का विमोचन केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि उस बहस का प्रतीक बन गया है जो आज देश में चल रही है। एक तरफ समर्थकों का उत्साह है, दूसरी तरफ लोकतांत्रिक मूल्यों और जवाबदेही को लेकर चिंताएं।
आखिरकार लोकतंत्र की ताकत नेताओं की पूजा में नहीं, बल्कि जनता के सवालों में छिपी होती है।
क्योंकि लोकतंत्र में नागरिकों का काम ताली बजाना नहीं, बल्कि समय-समय पर सवाल पूछना भी होता है।
Table of contents
Estimated reading time: 5 minutes




