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7 IITs में SC, ST, OBC की सिर्फ 18% फैकल्टी, 49.5% पद आरक्षित

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देश के प्रतिष्ठित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) में आरक्षित वर्गों के प्रतिनिधित्व को लेकर एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। देश के सात प्रमुख आईआईटी संस्थानों में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) समुदाय से ताल्लुक रखने वाली फैकल्टी की संख्या मात्र 18% है, जबकि नियमों के अनुसार इन वर्गों के लिए कुल 49.5% पद आरक्षित किए गए हैं।

आरटीआई से हुआ खुलासा, खड़गपुर में स्थिति सबसे खराब

यह जानकारी आईआईटी बॉम्बे के पूर्व छात्र प्रणव जीवन पी. द्वारा दायर की गई एक आरटीआई (RTI) के माध्यम से सामने आई है। आरटीआई से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक, देश के इन प्रमुख संस्थानों में खड़गपुर आईआईटी की स्थिति सबसे चिंताजनक बताई जा रही है।

आईआईटी खड़गपुर में कुल 781 फैकल्टी सदस्य कार्यरत हैं, जिनमें से एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के केवल 68 यानी महज 8.7% शिक्षक ही इन पदों पर हैं। केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान अधिनियम, 2019 के प्रावधानों के तहत फैकल्टी पदों में 15% पद एससी के लिए, 7.5% पद एसटी के लिए और 27% पद ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षित हैं। इसके बावजूद धरातल पर इन श्रेणियों का प्रतिनिधित्व निर्धारित कोटे से काफी कम बना हुआ है।

योग्यता का बहाনা और आवेदनकर्ताओं की स्थिति

संस्थानों पर अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि इन आरक्षित श्रेणियों के लिए योग्य उम्मीदवार उपलब्ध नहीं हो पाते हैं, जिसके चलते पद खाली रह जाते हैं। हालांकि, उपलब्ध आंकड़े इस दावे पर सवाल उठाते हैं।

विशेष बात यह है कि योग्य उम्मीदवारों की कोई कमी नहीं है। उदाहरण के लिए, आईआईटी खड़गपुर में वर्ष 2025 के दौरान मिले शिक्षक भर्ती के कुल आवेदनों में से 48% आवेदन इन्हीं आरक्षित वर्गों (एससी, एसटी और ओबीसी) के उम्मीदवारों की ओर से आए थे। इसके बावजूद आरोप लगाया जा रहा है कि संस्थान योग्य उम्मीदवार नहीं मिलने का बहाना बनाकर आरक्षित पदों को भरने में आनाकानी कर रहे हैं।

इसके अतिरिक्त, संस्थानों में बुनियादी सुविधाओं और मानसिक स्वास्थ्य सहायता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, आईआईटी खड़गपुर में 1,136 छात्रों पर केवल एक ही मेंटल हेल्थ विशेषज्ञ उपलब्ध है, जबकि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के तय मानकों के अनुसार प्रत्येक 500 छात्रों पर कम से कम एक मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ होना अनिवार्य है।

आईआईटी बॉम्बे में जातिगत भेदभाव और आत्महत्या के मामले

आईआईटी संस्थानों में जातिगत भेदभाव और छात्रों की आत्महत्या के मामलों ने भी गंभीर चिंता पैदा की है। गत 18 सितंबर को आईआईटी बॉम्बे के छात्र साहिल वाकोडे की आत्महत्या के बाद संस्थान पर जातिगत भेदभाव के गंभीर आरोप लगे थे। मृतक छात्र के पिता रवीन्द्र वाकोडे ने आरोप लगाया था कि उनके बेटे को संस्थान के भीतर बार-बार जातिगत भेदभाव और प्रताड़ना का सामना करना पड़ा था।

साहिल वाकोडे की मौत इस साल आईआईटी बॉम्बे में सामने आया तीसरा ऐसा मामला था, जबकि देश भर के विभिन्न आईआईटी संस्थानों में यह नौवां मामला बताया गया है। ग्लोबल आईआईटी एलुमनाई सपोर्ट ग्रुप के आंकड़ों के अनुसार, पिछले 20 वर्षों में देश के विभिन्न आईआईटी परिसरों में कुल 160 छात्रों ने आत्महत्या की है।

परिसरों में उठाए जा रहे सुधारात्मक कदम

छात्रों की आत्महत्याओं और बढ़ते दबाव की घटनाओं के बाद संस्थान प्रशासन अब कुछ सुधारात्मक कदम उठाने की बात कह रहा है। आईआईटी बॉम्बे में बीटेक छात्र साहिल वाकोडे की दुखद मौत के बाद संस्थान ने बड़ा फैसला लेते हुए कैंपस और हॉस्टलों से सीलिंग फैन हटाने का निर्णय लिया है। इनकी जगह अब दीवारों पर लगने वाले वॉल-माउंटेड फैन लगाए जाएंगे ताकि ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। सूत्रों के अनुसार, पंखों को बदलने के इस प्रस्ताव पर चर्चा इसी साल जुलाई में एक अन्य छात्र की मौत के बाद ही शुरू हो गई थी।

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