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कोइरीपुर रेलवे स्टेशन: विकास के नाम पर ठहराव की बलि

Koiripur railway station

कोइरीपुर सुलतानपुर : कोइरीपुर रेलवे स्टेशन में बीते कुछ वर्षों में जो बदलाव दिखे हैं, उन्हें अक्सर “विकास” के तौर पर पेश किया जाता है। कागज पर सब कुछ सकारात्मक लगता है। लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे अलग है। असल मुद्दा सुविधाओं का नहीं, ट्रेनों के ठहराव का है, और यहीं पर कोइरीपुर को लगातार नजरअंदाज किया गया।

एक समय था जब यहां चार ट्रेनों का ठहराव हुआ करता था। आज हाल यह है कि सिर्फ पैसेंजर ट्रेनें रुकती हैं। हावड़ा एक्सप्रेस और वरुणा एक्सप्रेस जैसी महत्वपूर्ण ट्रेनों के बंद होने से कोइरीपुर की सीधी कनेक्टिविटी कमजोर हो गई। यह बदलाव किसी तकनीकी मजबूरी का नतीजा नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं में हुए फेरबदल का संकेत देता है।

डबल लाइन होने से ट्रेनों का संचालन जरूर तेज और समयबद्ध हुआ, लेकिन इसका फायदा यात्रियों को कम और गुजरने वाली ट्रेनों को ज्यादा मिला। ट्रेनें अब बिना रुके निकल जाती हैं। स्टेशन पर प्लेटफॉर्म चमक रहे हैं, लेकिन यात्री घट रहे हैं—यह विरोधाभास ही पूरी कहानी बयान कर देता है।

सबसे अहम सवाल यह है कि जब आसपास के कई क्षेत्रों में एक्सप्रेस ट्रेनों का ठहराव बना रहा या बढ़ा, तो कोइरीपुर के साथ ऐसा क्यों हुआ? इसका जवाब स्थानीय राजनीति में छिपा है। आस-पास के क्षेत्रों में स्थानीय नेता अधिक सक्रिय रहे, उन्होंने रेलवे अधिकारियों से लगातार संवाद, पत्राचार और दबाव बनाया। नतीजा यह हुआ कि उन क्षेत्रों को ठहराव, सुविधाएं और महत्व मिला। वहीं कोइरीपुर में यह सक्रियता नदारद रही, या कहें कि प्रभावी नहीं रही।

स्थानीय स्तर पर महाकाल की सेना से जुड़े कुंवर कमल बरनवाल और संगठन के अन्य सदस्य लगातार यह मुद्दा उठाते रहे हैं। यह कोई एक दिन की आवाज नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रही मांग है—जिसे नजरअंदाज किया गया।

व्यापारियों की तरफ से भी पप्पू कौशल और सुनील बरनवाल साफ तौर पर कहते रहे हैं कि कोइरीपुर में सद्भावना एक्सप्रेस और बेगमपुरा एक्सप्रेस जैसी ट्रेनों का ठहराव होना चाहिए। उनका तर्क सीधा और व्यावहारिक है—
“अगर इन ट्रेनों का ठहराव मिलता है, तो राजधानी क्षेत्र की ओर आवागमन आसान होगा और कोइरीपुर के साथ-साथ आस-पास के तीन जिलों के यात्रियों को सीधी राहत मिलेगी”।

जब मांग लगातार उठ रही है, व्यापारी, सामाजिक संगठन और स्थानीय लोग एक सुर में बोल रहे हैं, तो फिर ठहराव क्यों नहीं मिल रहा? सच यह है कि मांग कमजोर नहीं है, पैरवी कमजोर है। जिन इलाकों में स्थानीय नेता इस मुद्दे को राजनीतिक दबाव में बदल पाए, वहां एक्सप्रेस रुकती रहीं। कोइरीपुर में आवाज तो उठी, लेकिन उसे असरदार मंच नहीं मिला

यह मान लेना कि स्टेशन भवन की मरम्मत या सोलर पैनल लगने से स्टेशन “अपग्रेड” हो गया, खुद को भ्रम में रखने जैसा है। रेलवे स्टेशन की असली ताकत ठहराव और कनेक्टिविटी होती है, न कि सिर्फ इमारतें। जब बड़ी ट्रेनें रुकना बंद कर दें, तो स्टेशन की भूमिका स्वतः सीमित हो जाती है।

कोइरीपुर इस दौड़ में पीछे रह गया जब तक एक्सप्रेस ट्रेनों का ठहराव वापस नहीं आता, तब तक यह विकास नहीं, बल्कि चयनात्मक अनदेखी ही कहलाएगी ।

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