Site icon News Hub Hindi

कोइरीपुर: पूर्वजों की धरोहर संभालने में नाकाम, नगर के चारों कोनों के तालाब उपेक्षा के शिकार ?

0cee87fe b6fa 4209 b65d 2a50e280b952

कोइरीपुर : कभी जल, हरियाली और तालाबों की वजह से एक संपन्न और संतुलित नगर माना जाता था। पूर्वजों ने दूरदर्शिता दिखाते हुए नगर के चारों कोनों पर तालाब बनवाए थे, ताकि हर दिशा से आने वाला वर्षा जल सहेजा जा सके, भूजल बना रहे और आने वाली पीढ़ियां पानी के लिए तरसें नहीं। आज वही कोइरीपुर एक असहज सवाल के सामने खड़ा है क्या इसकी संपन्नता पर किसी की नजर लग गई है, या फिर नगरवासी ही अपनी धरोहर के प्रति उदासीन हो चुके हैं?

सबसे चिंताजनक और शर्मनाक स्थिति नगर के पूर्वी प्रवेश द्वार पर, प्राथमिक विद्यालय के पास स्थित तालाब की है। यहां अब पानी का नामोनिशान तक नहीं बचा है। तालाब की जगह घास-फूस और मिट्टी ने ले ली है। जो तालाब कभी वर्षा जल को रोककर आसपास के हैंडपंप, कुएं और खेतों को जीवन देता था, वह आज एक सूखा मैदान बन चुका है। यह सिर्फ एक तालाब का सूखना नहीं है, बल्कि भविष्य के जल संकट की खुली चेतावनी है।

पश्चिम दिशा में स्थित हनुमान मंदिर तालाब कभी धार्मिक आस्था और सामाजिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था। पूजा, स्नान और अन्य आयोजनों के समय यहां भारी भीड़ रहती थी। आज यह तालाब भी अतिक्रमण, गंदगी और देखरेख की कमी से अपनी पहचान खोता जा रहा है। पानी की गहराई घट चुकी है और चारों ओर अव्यवस्था फैली हुई है।

उत्तर प्रवेश द्वार पर स्थित छोटा शिवाला तालाब भी बेहतर स्थिति में नहीं है। कभी बारिश के मौसम में यह तालाब अतिरिक्त पानी को सहेजकर जलभराव से नगर को बचाता था। आज संरक्षण के अभाव में इसकी उपयोगिता लगभग खत्म हो चुकी है। वहीं दक्षिण दिशा में स्टेशन रोड पर स्थित तालाब, जो नगर में प्रवेश करने वालों के लिए कोइरीपुर की पहली झलक हुआ करता था, अब उपेक्षा और लापरवाही की तस्वीर बन गया है।

जल की उपयोगिता को लेकर आज पूरे देश में चिंता जताई जा रही है। तालाब सिर्फ पानी जमा करने के गड्ढे नहीं होते, बल्कि ये भूजल रिचार्ज, तापमान संतुलन, पशु-पक्षियों के जीवन और खेती के लिए जीवनरेखा होते हैं। जब तालाब खत्म होते हैं, तो सबसे पहले हैंडपंप सूखते हैं, फिर खेत और अंत में इंसान पानी के लिए भटकता है। कोइरीपुर में यह प्रक्रिया धीरे-धीरे शुरू हो चुकी है, लेकिन अभी भी लोग गंभीरता को स्वीकार करने से बच रहे हैं।

यह कहना आसान है कि जिम्मेदारी प्रशासन की है, लेकिन यह आधा सच है। असली सच्चाई यह है कि समाज की भागीदारी लगभग खत्म हो चुकी है। जब तक नगर पंचायत, स्थानीय नागरिक, सामाजिक संगठन और जनप्रतिनिधि मिलकर तालाबों के पुनर्जीवन की ठोस पहल नहीं करेंगे, तब तक हालात नहीं बदलेंगे।

अगर अब भी आंखें मूंदे रखी गईं, तो आने वाली पीढ़ियां कोइरीपुर को तालाबों वाला नगर नहीं, बल्कि पानी के संकट से जूझता कस्बा कहेंगी अगर धरोहर नहीं संभाली गई, तो भविष्य भी हाथ से निकल जाएगा।

Exit mobile version