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पकौड़ा तलो से Gaming Content Creation तक: Budget 2026 का नया रोजगार मॉडल ?

pkoda rojgaar

नई दिल्ली।
सरकार द्वारा देश में Content Creator Lab खोलने की घोषणा के बाद एक बार फिर यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या यह पहल वास्तव में युवाओं को रोजगार देगी या फिर बेरोजगारी के मूल मुद्दे से ध्यान हटाने का एक और तरीका है। सरकार इसे डिजिटल स्किल्स और क्रिएटिव इकोनॉमी से जोड़कर भविष्य का अवसर बता रही है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे कहीं अधिक जटिल दिखाई देती है।

सरकारी दावे के मुताबिक, कंटेंट क्रिएटर लैब के जरिए युवाओं को वीडियो मेकिंग, एडिटिंग, सोशल मीडिया मैनेजमेंट और मोनेटाइजेशन जैसी स्किल्स सिखाई जाएंगी, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें। सवाल यह है कि क्या यह स्किल्स स्थायी आय और सुरक्षित भविष्य की गारंटी देती हैं, या केवल अस्थायी उम्मीदें पैदा करती हैं।


क्या कंटेंट क्रिएशन बेरोजगारी का जवाब है?

आज सोशल मीडिया पर कंटेंट क्रिएटर बनना जितना आसान दिखता है, वास्तविकता उतनी ही अस्थिर है। देश में पहले ही लाखों युवा YouTube, Instagram और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट बना रहे हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम लोग ही नियमित और भरोसेमंद कमाई कर पा रहे हैं। ज्यादातर युवा या तो बिना आय के संघर्ष कर रहे हैं या फिर एल्गोरिदम और ब्रांड डील्स पर पूरी तरह निर्भर हैं।

कंटेंट क्रिएशन पूरी तरह प्लेटफॉर्म आधारित अर्थव्यवस्था है, जहां न तो तय वेतन है, न सामाजिक सुरक्षा और न ही भविष्य की स्थिरता। एक एल्गोरिदम बदलाव, अकाउंट सस्पेंशन या प्लेटफॉर्म पॉलिसी में परिवर्तन से पूरी कमाई खत्म हो सकती है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या सरकार युवाओं को इस अनिश्चित मॉडल की ओर धकेल रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जब पहले से ही यह सेक्टर saturation की ओर बढ़ रहा है, तब बड़ी संख्या में नए कंटेंट क्रिएटर्स तैयार करना प्रतिस्पर्धा को और कठोर बना सकता है। इससे कुछ गिने-चुने लोग तो सफल होंगे, लेकिन बड़ी आबादी हाशिए पर चली जाएगी।


“पकौड़ा तलो” से “रील बनाओ” तक की नीति

कंटेंट क्रिएटर लैब को लेकर हो रही आलोचना इसलिए भी तेज है क्योंकि इसे पहले दिए गए “पकौड़ा तलो” जैसे बयानों की अगली कड़ी माना जा रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब रोजगार की बात ठेले या कढ़ाही की जगह कैमरे और मोबाइल तक सीमित कर दी गई है।

आलोचकों का कहना है कि सरकार धीरे-धीरे स्थायी नौकरियों, उद्योगों और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों से ध्यान हटाकर युवाओं को वैकल्पिक आजीविका की ओर मोड़ रही है। विकल्प होना गलत नहीं है, लेकिन जब विकल्प को समाधान की तरह पेश किया जाए, तब समस्या खड़ी होती है।

यह सच है कि कंटेंट क्रिएशन कुछ युवाओं के लिए सफल करियर बना है, लेकिन नीति निर्माण में अपवादों को आधार बनाना खतरनाक साबित हो सकता है। हर युवा न तो इंफ्लुएंसर बन सकता है और न ही ब्रांड डील हासिल कर सकता है।


निष्कर्ष: अवसर कम, सवाल ज्यादा

Content Creator Lab को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। यह डिजिटल स्किल्स सीखने का एक जरिया हो सकता है, लेकिन इसे बेरोजगारी का विकल्प या समाधान बताना वास्तविकता से आंख चुराने जैसा है। अगर सरकार वास्तव में युवाओं के भविष्य को लेकर गंभीर है, तो कंटेंट क्रिएशन के साथ-साथ स्थायी रोजगार, तकनीकी शिक्षा, उद्योग और रिसर्च में ठोस निवेश भी उतना ही जरूरी है।

वरना खतरा यह है कि एक पूरी पीढ़ी को यह भरोसा दिला दिया जाए कि रोजगार का रास्ता कैमरे के सामने है, जबकि ज़मीनी सच्चाई कहीं और है।

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