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संभल जामा मस्जिद सर्वे हिंसा: कोर्ट के आदेश पर 20 पुलिसकर्मियों पर FIR, पुलिस ने जताई अपील की बात

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संभल में जामा मस्जिद सर्वे के विरोध के दौरान हुई हिंसा का मामला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। इस बार कार्रवाई उपद्रवियों पर नहीं, बल्कि पुलिसकर्मियों पर FIR दर्ज करने के अदालती आदेश को लेकर चर्चा में है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने इस प्रकरण में तत्कालीन अधिकारियों सहित कुल 20 पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर सात दिन में रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं।

यह मामला 24 नवंबर 2024 का है। आरोप है कि जामा मस्जिद क्षेत्र में सर्वे के विरोध के दौरान पुलिस ने भीड़ पर फायरिंग की, जिसमें बिस्किट विक्रेता आलम को तीन गोलियां लगीं। बताया गया कि दो गोलियां उसकी पीठ में और एक हाथ में लगी। परिजनों का दावा है कि गोली लगने के बाद घायल आलम को स्थानीय स्तर पर इलाज नहीं मिला और बाद में मेरठ में पहचान व पता छिपाकर इलाज कराना पड़ा

इस मामले में पीड़ित पक्ष की ओर से संभल के मुहल्ला खग्गू सराय निवासी यामीन ने अदालत में वाद दायर किया था। वाद में आरोप लगाया गया कि घटना के समय मौके पर मौजूद तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी, इंस्पेक्टर अनुज तोमर समेत 15–20 पुलिसकर्मियों ने जान से मारने की नीयत से फायरिंग की। पीड़ित पक्ष का यह भी कहना है कि घटना के बाद कई स्तरों पर शिकायतें की गईं—यहां तक कि 31 दिसंबर 2024 को मुख्यमंत्री को पत्र भी भेजा गया—लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई, जिसके बाद अदालत की शरण ली गई।

अदालत ने वाद पत्र में प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर संभल कोतवाली पुलिस को FIR दर्ज करने और एक सप्ताह में रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया है। आदेश में तत्कालीन अधिकारियों के साथ अन्य पुलिसकर्मियों को भी नामजद किया गया है।

वहीं, पुलिस प्रशासन का पक्ष इससे अलग है। एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई ने कहा कि अदालत के आदेश की जानकारी मिली है, लेकिन पुलिस इस फैसले के खिलाफ अपील करेगी और फिलहाल FIR दर्ज नहीं की जाएगी। पुलिस का यह भी दावा है कि मामले में पहले ज्यूडिशियल इंक्वायरी हो चुकी है, जिसमें पुलिस कार्रवाई को सही ठहराया गया था।

गौरतलब है कि जिन अधिकारियों पर FIR के निर्देश दिए गए हैं, उनमें से अनुज चौधरी का प्रमोशन हो चुका है और वे वर्तमान में फिरोजाबाद ग्रामीण में एएसपी के पद पर तैनात हैं। ऐसे में कोर्ट के आदेश और पुलिस के रुख के बीच टकराव की स्थिति बन गई है।

यह मामला अब केवल हिंसा की जांच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि न्यायालय और पुलिस प्रशासन के बीच कानूनी प्रक्रिया को लेकर भी अहम सवाल खड़े कर रहा है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि पुलिस की अपील पर क्या निर्णय होता है और कोर्ट के आदेश पर आगे की कार्रवाई किस दिशा में जाती है।

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