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क्या चुनाव आयुक्त कानून से ऊपर हैं? SC ने केंद्र और चुनाव आयोग से जवाब मांगा

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नई दिल्ली | विशेष रिपोर्ट : सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को दी गई कानूनी सुरक्षा (लाइफटाइम इम्यूनिटी) के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई की। अदालत ने केंद्र सरकार और Election Commission of India को नोटिस जारी कर धारा-16 पर जवाब दाखिल करने के लिए कहा है, जो 2023 में पारित मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम के तहत शामिल की गई थी।

यह दायरा मुख्य रूप से यही करता है कि चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के दौरान किये गए कार्यों के लिए मुकदमों से मुकम्मल सुरक्षा दी जाये, अर्थात उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हो सकती। याचिका में यह दावा किया गया था कि यह सुरक्षा इतना व्यापक है कि यह संविधान के मूलभूत सिद्धांत — जैसे समता का अधिकार (अनुच्छेद 14) — का हनन कर सकती है, और इससे आयोग की जवाबदेही प्रभावित होती है।

अदालत के समक्ष याचिका एनजीओ लोक प्रहरी (Lok Prahari) ने पेश की है, जिसमें उसके सचिव एस. एन. शुक्ला (पूर्व आईएएस) खुद पैरवी कर रहे हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इतनी व्यापक कानूनी छूट तो देश के राष्ट्रपति और राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों को भी नहीं दी जाती है और चुनाव आयुक्तों को यह सुरक्षा देना लोकतंत्र की पारदर्शिता और चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता के सिद्धांतों के खिलाफ जा सकता है। उन्होंने कहा कि यदि कोई चुनाव आयुक्त कोई गलती करता है या दुरुपयोग करता है, तब भी उसे कोई मुकदमा नहीं झेलना पड़ेगा, जो जवाबदेही के मूल सिद्धांत के विपरीत है।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत (CJI Surya Kant) और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि इस प्रावधान की संवैधानिक वैधता और प्रभाव की जांच की जाएगी। कोर्ट ने फिलहाल इस धारा पर रोक नहीं लगाई है और कहा है कि केंद्र और आयोग की दलीलों को सुनने के बाद ही कोई आगे का आदेश दिया जाएगा।

विशेष रूप से, याचिका में यह भी प्रश्न उठाया गया है कि ये सुरक्षा केवल अधिकारी के कार्यकाल के दौरान ही क्यों नहीं सीमित है, बल्कि उसके बाद भी जारी रहती है, जबकि पारंपरिक रूप से ऐसे व्यापक मुकदमे-से-रक्षा के अधिकार सर्वोच्च पदों पर ही दिए जाते हैं।

यह मामला संवैधानिक, प्रशासनिक आज़ादी और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता से जुड़ा है, और अदालत अब तय करेगी कि क्या इस धारा-16 जैसी सुरक्षा लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के अनुरूप है या नहीं।

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