माघ मेले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ कथित दुर्व्यवहार का मामला अब और गंभीर होता जा रहा है। इस मुद्दे पर द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने सरकार और प्रशासन को कड़ी नसीहत दी है।
स्वामी सदानंद सरस्वती ने साफ शब्दों में कहा कि शंकराचार्य की परंपरा गुरु-शिष्य प्रणाली पर टिकी होती है, न कि किसी प्रशासनिक आदेश या सरकारी मुहर पर। उन्होंने कहा, “मैं स्वयं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के अभिषेक का साक्षी रहा हूं।” ऐसे में उनकी वैधता पर सवाल उठाना धार्मिक परंपराओं में सीधा हस्तक्षेप है।
शनिवार को मुक्तानंद संस्कृत पाठशाला के जीर्णोद्धार समारोह में पहुंचे शंकराचार्य ने बताया कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का श्रृंगेरी पीठ में विधिवत अभिषेक हुआ था। उन्होंने कहा कि उनके गुरु ने केवल दो शिष्यों को संन्यास दिया—एक वे स्वयं और दूसरे अविमुक्तेश्वरानंद। इसलिए उनकी पहचान पर सवाल उठाना निराधार और अज्ञानता है।
उन्होंने प्रशासनिक रवैये की आलोचना करते हुए सत्ता के अहंकार पर भी प्रहार किया। स्वामी सदानंद सरस्वती ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि सत्ता कभी स्थायी नहीं होती, और सत्ता के नशे में लिए गए फैसले अंततः समाज में बदनामी का कारण बनते हैं। माघ मेले में किसी ब्राह्मण बालक या साधु-संत को गंगा स्नान से रोकना अक्षम्य है।
शंकराचार्य ने यह भी कहा कि सरकार का काम धार्मिक विरासत में दखल देना नहीं, बल्कि उसकी रक्षा करना है। यदि तंत्र अपनी मर्यादा भूलता है, तो समाज उसे स्वीकार नहीं करेगा। अंत में उन्होंने समाज से संयम और सम्मान बनाए रखने की अपील की, ताकि परंपरा और व्यवस्था के बीच टकराव न बढ़े।

