सुल्तानपुर मेडिकल कॉलेज में अल्ट्रासाउंड जांच की व्यवस्था इन दिनों अस्थायी और जुगाड़ के सहारे चल रही है। हालत यह है कि इलाज कराने आए मरीजों को अल्ट्रासाउंड के लिए तीन से चार दिन तक इंतजार करना पड़ रहा है। मजबूरी में कई मरीज निजी डायग्नोस्टिक सेंटरों का रुख कर रहे हैं, जहां उन्हें भारी रकम खर्च करनी पड़ रही है।
जानकारी के अनुसार, मेडिकल कॉलेज में तैनात अस्थायी रेडियोलॉजिस्ट डॉ. आर. पी. सिंह ने बीते 8 अगस्त को अवकाश लिया था और कुछ दिनों बाद स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया। इसके बाद से अल्ट्रासाउंड जांच की व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो गई।
जांच प्रभावित होने पर स्वास्थ्य विभाग ने अस्थायी समाधान के तौर पर विरसिंहपुर स्थित 100 शय्या अस्पताल के रेडियोलॉजिस्ट डॉ. राधेश्याम यादव को मेडिकल कॉलेज से संबद्ध किया। पहले उन्हें सप्ताह में तीन दिन (सोमवार, मंगलवार और शनिवार) की ड्यूटी दी गई थी, लेकिन बाद में यह घटाकर केवल दो दिन — सोमवार और बुधवार कर दी गई।
स्थिति यह है कि मेडिकल कॉलेज में हफ्ते में सिर्फ दो दिन ही अल्ट्रासाउंड हो पा रहा है। कई बार इन दोनों दिनों में भी रेडियोलॉजिस्ट की अतिरिक्त ड्यूटी लग जाने के कारण जांच नहीं हो पाती, जिससे मरीजों को खाली हाथ लौटना पड़ता है।
इलाज कराने आए रामसुख ने बताया कि पेट दर्द की शिकायत पर फिजिशियन ने पथरी की आशंका जताते हुए अल्ट्रासाउंड कराने की सलाह दी, लेकिन उन्हें बताया गया कि जांच के लिए अगले सोमवार को आना होगा। इससे उनका इलाज भी देरी से शुरू हो पाएगा।
वहीं, राजेश नामक मरीज ने बताया कि एक सप्ताह से पेट दर्द झेल रहे थे। अल्ट्रासाउंड में देरी के चलते मजबूरी में निजी सेंटर जाकर 800 रुपये खर्च कर जांच करानी पड़ी।
मरीजों का कहना है कि जब मेडिकल कॉलेज जैसे सरकारी संस्थान में समय पर जांच नहीं हो पा रही, तो गरीब और मध्यम वर्ग के लोग इलाज कैसे कराएं। अल्ट्रासाउंड जैसी बुनियादी जांच के लिए निजी खर्च करना उनके लिए बड़ी परेशानी बन गया है।
इस पूरे मामले पर मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. सलिल श्रीवास्तव ने बताया कि रेडियोलॉजिस्ट की नियमित नियुक्ति के लिए पत्राचार चल रहा है। उन्होंने आश्वासन दिया कि जल्द ही यह समस्या दूर कर ली जाएगी और अल्ट्रासाउंड की व्यवस्था नियमित रूप से शुरू हो जाएगी।
हालांकि, जब तक स्थायी नियुक्ति नहीं होती, तब तक मरीजों को इसी अव्यवस्था का सामना करना पड़ रहा है, जो सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी हकीकत को उजागर करता है।

