BMC कमिश्नर को सुप्रीम कोर्ट का अवमानना नोटिस, जानें पूरा मामला

नई दिल्ली/मुंबई: सुप्रीम कोर्ट ने बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (BMC) के म्युनिसिपल कमिश्नर के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्रवाई शुरू कर दी है। मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने बीएमसी कमिश्नर को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। यह सख्त कदम बोरीवली स्थित एक सार्वजनिक बस स्टैंड की जमीन से अतिक्रमण न हटाने के मामले में उठाया गया है। अदालत ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं और चेतावनी दी है कि यदि आदेशों का पालन नहीं हुआ, तो अधिकारियों को जेल भेजा जाएगा।

अतिक्रमण हटाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट की कड़ी नाराजगी

यह पूरा कानूनी विवाद मुंबई के बोरीवली इलाके में स्थित बृहन्मुंबई इलेक्ट्रिक सप्लाई एंड ट्रांसपोर्ट (BEST) बस स्टैंड की जमीन से जुड़ा हुआ है। इस जमीन पर कब्जे को लेकर बीएमसी और एक निजी डेवलपर के बीच लंबे समय से कानूनी लड़ाई चल रही थी।

मामले की सुनवाई कर रही तीन सदस्यीय पीठ—जिसमें चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना शामिल हैं—ने बीएमसी अधिकारियों की मंशा पर सवाल खड़े किए। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने तीखा सवाल पूछते हुए कहा, “क्या बीएमसी के अधिकारी अतिक्रमण करने वालों के साथ मिलीभगत कर रहे हैं? क्या इससे यह नहीं दिखता कि आपके अधिकारी मिलीभगत कर रहे हैं? हम उन्हें जेल भेजेंगे, तब उन्हें सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अहमियत समझ में आ जाएगी।”

क्या था सुप्रीम कोर्ट का पिछला निर्देश?

इस मामले में 13 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एक स्पष्ट निर्देश जारी किया था। अदालत ने निजी डेवलपर को प्रशासनिक भवन समेत संबंधित भूखंड का खाली और शांतिपूर्ण कब्जा बीएमसी को सौंपने का आदेश दिया था।

इस प्रक्रिया के तहत बीएमसी को तीन महीने का समय दिया गया था। अदालत के निर्देशानुसार, बीएमसी को निम्नलिखित कार्य करने थे:

  • जमीन का कब्जा अपने हाथ में लेना
  • कानून के मुताबिक शेष अतिक्रमण को हटाना
  • बस स्टेशन को पूरी तरह से चालू करना

हालांकि, तय समय सीमा यानी 13 नवंबर 2025 तक जमीन से अतिक्रमण पूरी तरह नहीं हटाया गया। इसी बात से नाराज होकर सुप्रीम कोर्ट ने बीएमसी कमिश्नर को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया था और अब अवमानना की कार्रवाई शुरू की गई है।

मराठी दस्तावेजों के अनुवाद की दलील पर भड़का कोर्ट

सुनवाई के दौरान जब बीएमसी की ओर से यह दलील दी गई कि स्थानीय अधिकारियों को अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई से पहले मराठी दस्तावेजों का अंग्रेजी में अनुवाद कराने की जरूरत है, तो सुप्रीम कोर्ट का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया।

जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने इस दलील पर तीखा सवाल करते हुए पूछा कि हलफनामा दाखिल करने वाले अधिकारी डॉ. तांबे हैं, तो क्या अदालत यह मान ले कि उन्हें मराठी भाषा नहीं आती? अदालत ने इस प्रकार के प्रशासनिक बहानों को पूरी तरह खारिज कर दिया और इसे काम टालने की एक रणनीति करार दिया।

अजय देवगन के बंगले के कथित अवैध निर्माण पर भी बीएमसी की कार्रवाई चर्चा में

इस बीच, बीएमसी एक अन्य मामले को लेकर भी चर्चा में है। हाल ही में नगर निगम ने बॉलीवुड अभिनेता अजय देवगन के जुहू स्थित बंगले में कथित तौर पर बिना अनुमति के किए गए निर्माण के खिलाफ कार्रवाई की है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बीएमसी ने नोटिस देने के बाद बंगले के उस हिस्से को तोड़ा है जिसे अवैध निर्माण के दायरे में पाया गया था। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट द्वारा बीएमसी कमिश्नर को नोटिस जारी किए जाने के बाद प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है।

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