Sonia Gandhi Book: मोदी और मेरी सोच अलग, सोनिया गांधी ने अपनी किताब में खोले कई राज

कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपनी नई आत्मकथा ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव’ (Belonging: A Journey of Love) के माध्यम से अपनी निजी जिंदगी, राजीव गांधी के साथ अपने रिश्तों और भारतीय राजनीति के लंबे सफर पर खुलकर बातचीत की है। 10 नवंबर को लॉन्च होने वाली इस किताब को लेकर राजनीतिक गलियारों में काफी चर्चा है। प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार ‘द हिंदू’ को दिए गए एक विस्तृत इंटरव्यू में सोनिया गांधी ने इटली से भारत आने के बाद अपने जीवन में आए बदलावों, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी से सीखे गए जीवन मूल्यों और देश की वर्तमान राजनीतिक स्थिति पर अपने विचार रखे हैं।

राजीव गांधी से मुलाकात और निजी जीवन के अनछुए पहलू

सोनिया गांधी ने इंटरव्यू के दौरान बताया कि राजीव गांधी से पहली मुलाकात और उसके 60 साल बीत जाने के बाद भी उनके मूल स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया है। उन्होंने कहा कि आज भी वह इंसानी तौर पर वही शख्सियत हैं, बस फर्क इतना है कि पहले के मुकाबले वह अब कम हंसती और मुस्कुराती हैं। अपने बचपन के संस्कारों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि परिवार के प्रति वफादारी, सच्चाई, संवेदनशीलता और अपने कर्तव्यों का निर्वहन जैसे मूल्य उनके भीतर आज भी पूरी तरह से जीवित हैं।

अपनी किताब के बारे में बात करते हुए उन्होंने बताया कि उन्होंने पहली बार एक दशक से अधिक समय पहले लिखना शुरू किया था, लेकिन पिछले पांच वर्षों में इसे गंभीरता से आगे बढ़ाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि इतने वर्षों तक उनके बारे में 75 से अधिक किताबें और जीवनियां लिखी जा चुकी थीं, जिन्हें उन्होंने कभी पढ़ने की इच्छा नहीं जताई, लेकिन एक समय ऐसा आया जब उन्हें लगा कि उन्हें अपनी कहानी खुद दुनिया के सामने रखनी चाहिए।

आपातकाल और राजनीतिक निर्णयों पर खुलकर रखी राय

किताब में देश के सबसे संवेदनशील दौर यानी आपातकाल (Emergency) का भी जिक्र किया गया है। सोनिया गांधी ने माना कि उस दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों पर अंकुश लगाया गया था और बंदी प्रत्यक्षीकरण के अधिकारों को निलंबित किया गया था। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि उस समय इंदिरा गांधी के सामने गंभीर चुनौतियां थीं, जिसमें देश में हो रहे हिंसक प्रदर्शन, सरकारी संपत्तियों को नुकसान और प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली घटनाएं शामिल थीं। उन्होंने याद दिलाया कि बाद में इंदिरा गांधी ने खुद हालात को समझा और मार्च 1977 में चुनाव कराने का फैसला करते हुए सार्वजनिक रूप से खेद भी जताया था।

प्रधानमंत्री पद ठुकराने और वैचारिक मतभेदों पर विचार

किताब के 30वें अध्याय में साल 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस की जीत के बावजूद प्रधानमंत्री पद न स्वीकार करने के फैसले पर भी प्रकाश डाला गया है। सोनिया गांधी ने बताया कि उनके बच्चों—राहुल गांधी और प्रियंका गांधी—के मन में अपनी दादी और पिता की हत्याओं के कारण गहरा डर था, जिसके चलते वे इस पद के सख्त खिलाफ थे। परिवार की सुरक्षा और राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए उन्होंने अंततः प्रधानमंत्री पद न लेने का फैसला किया और डॉ. मनमोहन सिंह को देश की कमान सौंपी गई।

वर्तमान राजनीतिक माहौल पर बात करते हुए सोनिया गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी वैचारिक दुनिया पूरी तरह अलग है। उन्होंने दावा किया कि पिछले 12 वर्षों में देश के लोकतंत्र, संस्थाओं और सामाजिक ताने-बाने को गहरा नुकसान पहुंचा है। हालांकि, उन्होंने पूरा भरोसा जताया कि देश की जनता जल्द ही सुशासन की वापसी का स्वागत करेगी और कांग्रेस पार्टी समान विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर संविधान और लोकतंत्र के मूल्यों की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष करती रहेगी।

कांग्रेस पार्टी का भविष्य और वैचारिक दृढ़ता

कांग्रेस पार्टी की मौजूदा स्थिति को लेकर पूछे गए सवाल पर सोनिया गांधी ने किसी भी तरह की निराशा से इनकार किया। उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों को समान अवसर (Level Playing Field) नहीं मिल रहा है और प्रमुख संस्थाओं पर नियंत्रण जैसी चुनौतियां सामने हैं, फिर भी कांग्रेस पार्टी ने असाधारण साहस का परिचय दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्टी ने कभी भी आरएसएस (RSS) और बीजेपी के साथ कोई वैचारिक समझौता नहीं किया है और भविष्य में भी कभी ऐसा नहीं किया जाएगा।

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