नई दिल्ली की राऊज एवेन्यू अदालत ने आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को दिल्ली आबकारी नीति मामले में 23 अन्य आरोपियों के साथ बरी कर दिया। इस मामले को आम तौर पर “दिल्ली शराब नीति घोटाला” कहा जाता है। हालांकि, जांच एजेंसी सीबीआई ने निचली अदालत के फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देने का फैसला किया है।
मामला शुरू कैसे हुआ?
नवंबर 2021 में दिल्ली सरकार ने नई आबकारी नीति लागू की। सरकार का दावा था कि नीति का उद्देश्य शराब कारोबार में पारदर्शिता लाना और राजस्व बढ़ाना है। लेकिन कुछ महीनों बाद विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने आरोप लगाया कि नीति के जरिए कुछ निजी थोक विक्रेताओं को अनुचित लाभ पहुंचाया गया।
विवाद बढ़ने के बाद 2022 में दिल्ली सरकार ने नीति वापस ले ली। इसके बाद उपराज्यपाल की सिफारिश पर मामले की सीबीआई जांच शुरू हुई।
जांच एजेंसियों के आरोप
सीबीआई ने आरोप लगाया कि नीति में बदलाव कर कुछ कंपनियों को फायदा पहुंचाया गया और बदले में कथित रूप से 100 करोड़ रुपये की रिश्वत ली गई। जांच एजेंसी का दावा था कि इस कथित राशि का इस्तेमाल गोवा और पंजाब विधानसभा चुनावों में प्रचार के लिए किया गया।
चार्जशीट में अरविंद केजरीवाल को मुख्य साजिशकर्ता बताया गया, जबकि मनीष सिसोदिया पर आबकारी मंत्री के रूप में “मनमाने फैसले” लेने का आरोप लगाया गया। बाद में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी मनी लॉन्ड्रिंग के तहत जांच शुरू की और 21 मार्च 2024 को केजरीवाल को गिरफ्तार किया। 26 जून 2024 को सीबीआई ने भी उन्हें गिरफ्तार किया।
राजनीतिक टकराव
आप और इंडिया गठबंधन ने इन कार्रवाइयों को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया। केजरीवाल ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार एजेंसियों का इस्तेमाल कर उनकी पार्टी को कमजोर करना चाहती है। दूसरी ओर भाजपा ने इसे “भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई” करार दिया।
अदालत का फैसला
लंबी सुनवाई और महीनों जेल में रहने के बाद राऊज एवेन्यू कोर्ट ने सबूतों के आधार पर केजरीवाल, सिसोदिया और अन्य आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत के फैसले के बाद राजनीतिक बयानबाजी फिर तेज हो गई है। मामला अब उच्च न्यायालय में नई कानूनी लड़ाई की ओर बढ़ सकता है।




