भारत में स्वास्थ्य और प्रशासनिक आंकड़ों को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS 2019-21) के आंकड़ों के मुताबिक, देश भर में होने वाली कुल मौतों में से करीब 30% मौतें सरकारी रिकॉर्ड से बाहर रह जाती हैं। यानी इनका आधिकारिक पंजीकरण नहीं हो पाता है। ग्रामीण इलाकों और महिलाओं के मामलों में यह स्थिति और भी अधिक गंभीर बनी हुई है।
देश के 122 जिलों में महिलाओं की 40% से भी कम मौतें दर्ज
डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों के अनुसार, देश के 707 जिलों में से 122 जिले ऐसे हैं जहां महिलाओं की मौतों का पंजीकरण 40% से भी कम दर्ज किया गया है। महिलाओं की मौत का कम पंजीकरण होना देश की नागरिक पंजीकरण और महत्वपूर्ण सांख्यिकी (CRVS) प्रणाली के सामने एक बड़ी चुनौती को उजागर करता है।
राज्यों के हिसाब से स्थिति देखें तो बिहार के 38 में से 37 जिलों में महिलाओं की मौतों का पंजीकरण 60% से कम पाया गया है, और झारखंड में भी कमोबेश यही स्थिति बनी हुई है। इसके अलावा, अरुणाचल प्रदेश के कुरुंग कुमे जिले में तो महिलाओं की मात्र 5% मौतें ही आधिकारिक तौर पर दर्ज की गईं।
कुल मौतों में पुरुष और महिला पंजीकरण का अंतर
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2019-21) की रिपोर्ट बताती है कि देश में कुल मौतों में से केवल 70.8% का ही पंजीकरण हो पाता है। इसमें भी लिंग के आधार पर बड़ा अंतर देखने को मिलता है।
- देशभर में पुरुषों की 73% मौतें सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज की जाती हैं।
- वहीं, महिलाओं के मामले में यह आंकड़ा गिरकर केवल 64% पर ही सिमट जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सामाजिक कारणों, जागरूकता की कमी और दूरदराज के इलाकों में प्रशासनिक पहुंच न होने के कारण महिलाओं के मृत्यु पंजीकरण के आंकड़े पुरुषों के मुकाबले काफी पीछे छूट जाते हैं।
आकांक्षी जिलों में स्थिति पिछड़ी, केवल 54.4% पंजीकरण
विकास के लिहाज से पिछड़े देश के 112 आकांक्षी जिलों में मृत्यु पंजीकरण की स्थिति और भी चिंताजनक है। इन जिलों में केवल 54.4% मौतें ही दर्ज हो पाती हैं, जबकि देश के अन्य सामान्य जिलों में यह आंकड़ा औसतन 73.7% है। आकांक्षी जिलों और अन्य जिलों के बीच यह 19.3% अंकों का अंतर ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में स्वास्थ्य एवं प्रशासनिक बुनियादी ढांचे की कमियों को साफ दर्शाता है।
सीआरवीएस प्रणाली को मजबूत करने पर जोर
विशेषज्ञों का कहना है कि सिविल रजिस्ट्रेशन एंड वाइटल स्टैटिस्टिक्स (CRVS) प्रणाली को जमीनी स्तर पर और अधिक मजबूत करने की सख्त आवश्यकता है। इसके लिए पंचायतों, आशा कार्यकर्ताओं और आंगनवाड़ी केंद्रों की सक्रिय मदद ली जानी चाहिए ताकि वे ग्रामीण परिवारों को हर मौत का समय पर आधिकारिक पंजीकरण कराने में सहायता प्रदान कर सकें।
अन्य बड़ी खबर: आईआईटी संस्थानों में फैकल्टी का आरक्षण
इस बीच, उच्च शिक्षण संस्थानों से जुड़ी एक अन्य रिपोर्ट में सामने आया है कि देश के सात आईआईटी (IIT) संस्थानों में एससी, एसटी और ओबीसी समुदाय से आने वाली फैकल्टी की संख्या मात्र 18% है। जबकि नियमों के तहत इन आरक्षित वर्गों के लिए कुल 49.5% पद आरक्षित हैं। गौरतलब है कि इसी साल आईआईटी बॉम्बे में जातिगत भेदभाव के आरोप भी सामने आ चुके हैं, जिससे परिसरों में सामाजिक विविधता और प्रतिनिधित्व का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है।

